गणतंत्र के 71 वर्ष

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गणतंत्र के इक्कतर वर्ष व्यतीत होने जा रहे हैं। आज देश अपने गणतंत्र के बहत्तरवें वर्ष में प्रवेश कर रहा हैं। इतने वर्षों मे देश ने बहुत से उतार चढ़़ाव देखे। आजादी के बाद की यह यात्रा सफलताओं के कीर्तिमान स्थापित करने की तो है ही, पर नेताओं तथा आम आदमी के चरित्र, नैतिकता,ईमानदारी, सिद्वांतों, आदर्शो से निचले स्तर तक गिरने की यात्रा भी कही जा सकती है। जहॉ जहॉं नागरिकों ने अपने उत्तरदायित्वों को अपना कर्तव्य समझ कर पूरा किया वहॉं देश ने सफलता के नये आयाम स्थापित किये। हमारे संविधान ने एक स्वाधीन लोकतंत्र के नागरिक के रूप में हम सब को कुछ अधिकारों के साथ जिम्मेदारी प्रदान की है उस पर विशेष ध्यान दिया जाना समय की मांग है। जिम्मेदारी की यह भावना केवल न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के मूलभूत लोकतांत्रिक आदर्शो के प्रति प्रतिबद्ध रहने को ही नहीं कहती, बल्कि यह भी अपेक्षा रखती है कि गण के तंत्र के रूप में हम परिपक्व नागरिकों सरीखा व्यवहार करें। इसकी आवश्यकता इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि देश ही नहीं, दुनिया की भारत से अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। जब दुनिया भारत को एक ऐसे उभरते हुए देश के रूप में देख रही हो जो विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ने में सक्षम है तो फिर इसका कोई मतलब नहीं कि संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों का मनमाना इस्तेमाल होता हुआ दिखे। दुर्भाग्य से आज ऐसा ही हो रहा है। इसके चलते न केवल भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित होती है, बल्कि कुछ दुराग्रही शक्तियों को अनावश्यक उपदेश देने का अवसर भी मिलता है।  गणतंत्र के रूप में सात दशक के लंबे सफर को तय करने वाले भारत को देश-दुनिया के मामले में विवेकपूर्ण राष्ट्र के रूप में आचरण करते हुए दिखना ही चाहिए। निःसंदेह भारत की ऐसी छवि तभी निर्मित होगी जब हम भारत के लोग धीर-गंभीर आचरण का परिचय देंगे। गणतंत्र के इक्कतर वर्षों की यात्रा में सफलता के आयाम स्थापित करते हुए देश आज चॉंद के निकट पहुंॅंच गया हैं पर अभी भी सवा अरब से अधिक की आबादी मे से बहुतों को आवास, रोजगार, जीवन जीने की सुविधा, सुरक्षा नहीं दे पाए, पर इतनी विशाल आबादी मे सभी को सब कुछ प्राप्त हो जाए यह सम्भव भी नहीं हो सकता। आए दिन हर शहर, नगर में हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, सड़कों पर जाम, तोड़ फोड़, बसों, ट्रेनो, दुकानों, सरकारी कार्यालयों में आग लगाना, लूटमार, चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार अब खबरें नहीं, रोज के जीवन का हिस्सा बन गयी हैं। इससे बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि एक गणतंत्र के रूप में हम वह सब कुछ हासिल नहीं कर सके हैं जो हमारे साथ ही स्वतंत्र हुए अनेक देशों ने हासिल कर लिया है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम अपनी तमाम उपलब्धियों की अनदेखी कर दें। दुर्भाग्य से कुछ लोग यही कर रहे हैं। उनका नकारात्मक रवैया एक तरह के रुदन में बदल गया है। इस मानसिकता से कभी कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तभी सही दिशा में आगे बढ़ते हैं जब वे सकारात्मक भाव से लैस होकर आगे बढ़ते हैं। यही भाव हर तरह की समस्याओं के समाधान की कुंजी प्रदान करता है।

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