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निर्भया मामले में दोषियों के वकील एपी सिंह इन दिनों खासी चर्चा में हैं। ए.पी सिंह के कानूनी दांव पेच के चलते ही निर्भया के चारों दोषी जो कई महीने से फांसी से बचते चले आ रहे हैं एक बार फिर उनकी कानूनी तिकड़म बाजी चल ही गई। सोमवार को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में यही हुआ, जब उन्होंने अपने कानूनी दांवपेच से 3 मार्च की सुबह होने वाली चारों दोषियों की फांसी की सजा टल गई।  वर्ष, 2013 में जब कोई भी वकील निर्भया के दोषियों का केस लड़ने के लिए आगे नहीं आ रहा था तो एपी सिंह ने आगे बढ़कर यह केस अपने हाथ में लिया था और 7 साल बाद भी दोषियों के पक्ष में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। निर्भया मामले में दोषियों का केस लड़ने के दौरान वह कई बार निचली अदालत से लेकर दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक से वह फटकार खा चुके हैं।
16 दिसंबर, 2012 को निर्भया के साथ दक्षिण दिल्ली के वसंत विहार इलाके में चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म हुआ था। सामूहिक दुष्कर्म के दौरान सभी 6 दरिंदों ने इस कदर निर्भया को शारीरिक प्रताड़ना दी कि उसकी इलाज के दौरान मौत हो गई।  फास्ट ट्रैक में मुकदमा चला, जिसके बाद निचली अदालत, दिल्ली हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट चार दोषियों विनय, मुकेश, पवन और अक्षय को फांसी की सजा सुना चुका है।  निर्भया मामले में चारों दोषियों को 3 मार्च को दी जाने वाली फांसी के टल जाने से अब तो यह सोचने को हर भारतवासी मज़बूर है कि जिस तरह से निर्भया के सभी दोषी कानूनी दांव चल रहे हैं, उससे अब निर्भया के दोषियों को फांसी लग भी पायेगी या नहीं। निर्भया के चारों दोषियों में एक पवन नामक युवक की दया याचिका भी राष्ट्रपति की ओर से खारिज कर दी गई है। गत सोमवार सुबह सुप्रीम कोर्ट से सुधारात्मक याचिका खारिज होने के बाद पवन ने राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर की थी और यह दया याचिका खारिज होने की जानकारी पवन के वकील एपी सिंह ने सोमवार को दिल्ली की पटियाला हाउस में सुनवाई के दौरान दी।
हालांकि यह निर्भया केस का चौथा डेथ वारंट था लेकिन अब इसके बाद यह दरिंदें स्वयं को बचाने के लिए कोई दांव पेंच लगा भी पाएंगे या नहीं लगा पाएंगे चूंकि अब दोषी पहले ही अलग-अलग कानूनी विकल्पों के जरिए लगातार अपने आप को बचाते आए हैं लेकिन अब दोषियों को फांसी से बचाने का अदालत के पास भी कोई अधिकार नहीं है।
सात साल पहले जब दिल्ली में निर्भया के साथ घृणित सामूहिक बलात्कार हुआ था, तब पूरा देश उठ खड़ा हुआ था। देश भर के युवा सड़कों पर उतर आए थे। सरकार, समाज के एक बडे़ तबके और सभी राजनीतिक दलों ने यह संकल्प लिया था कि अब कोई और निर्भया नहीं होगी। उस आंदोलन और उन संकल्पों से एक बार लगने लगा था कि अब सूरत बदलेगी ही, देश में महिलाएं पहले से सुरक्षित होंगी। यह उस समय का आवेग था, जो सरकार पर कुछ करने का दबाव भी बना रहा था और हमें कई तरह के आश्वासन भी दे रहा था। महिलाओं को सिर्फ कानूनों में ही नहीं, सामाजिक धारणा के स्तर पर बराबरी का दर्जा देकर और उनकी सार्वजनिक सक्रियता बढ़ाकर ही इस मानसिकता को खत्म किया जा सकता है। इससे हम ऐसा समाज भी तैयार कर पायेंगे, जो कुंठित मानसिकता वालों को बहिष्कृत कर सकेगा।

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